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गीत "आशाएँ विश्वास जगाती" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Saturday, August 1, 2015

आशा पर ही प्यार टिका है।
आशा पर संसार टिका है।।

आशाएँ ही वृक्ष लगाती,
आशाएँ विश्वास जगाती,
आशा पर परिवार टिका है।
आशा पर संसार टिका है।।

आशाएँ श्रमदान कराती,
पत्थर को भगवान बनाती,
आशा पर उपकार टिका है।
आशा पर संसार टिका है।।

आशा यमुना, आशा गंगा,
आशाओं से चोला चंगा,
आशा पर उद्धार टिका है।
आशा पर ही प्यार टिका है।।

आशाओं में बल ही बल है,
इनसे जीवन में हलचल है.
खान-पान आहार टिका है।
आशा पर संसार टिका है।।

आशाएँ हैं, तो सपने है,
सपनों में बसते अपने हैं,
आशा पर व्यवहार टिका है।
आशा पर संसार टिका है।।

आशाओं के "रूप" बहुत हैं,
शीतल छाया धूप बहुत है,
प्रीत-रीत-मनुहार टिका है।
आशा पर संसार टिका है।।

आशाएँ जब उठ जायेंगी,
दुनियादारी लुट जायेंगी,
उड़नखटोला द्वार टिका है।
आशा पर संसार टिका है।।

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"लगता है बसन्त आया है" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

Tuesday, January 20, 2015

 टेसू की डालियाँ फूलतीं, 
खेतों में बालियाँ झूलतीं, 
लगता है बसन्त आया है! 

केसर की क्यारियाँ महकतीं, 
बेरों की झाड़ियाँ चहकती, 
लगता है बसन्त आया है!

sun 
आम-नीम पर बौर छा रहा, 
प्रीत-रीत का दौर आ रहा, 
लगता है बसन्त आया है!

सूरज फिर से है मुस्काया , 
कोयलिया ने गान सुनाया, 
लगता है बसन्त आया है! 
जय हो जय, शिव-शंकर की जय!
शिव का है घर-घर में वन्दन, 
उपवन में छाया स्पन्दन, 
लगता है बसन्त आया है!
 

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"गीत-फिर से चमकेगा गगन-भाल" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Sunday, December 28, 2014

फिर से चमकेगा गगन-भाल।
आने वाला है नया साल।।

आशाएँ सरसती हैं मन में,
खुशियाँ बरसेंगी आँगन में,
सुधरेंगें बिगड़े हुए हाल।
आने वाला है नया साल।।
होंगी सब दूर विफलताएँ,
आयेंगी नई सफलताएँ,
जन्मेंगे फिर से पाल-बाल।
आने वाला है नया साल।।

सिक्कों में नहीं बिकेंगे मन,
सत्ता ढोयेंगे पावन जन,
अब नहीं चलेंगी वक्र-चाल।
आने वाला है नया साल।।

हठयोगी, पण्डे और ग्रन्थी,
हिन्दू-मुस्लिम, कट्टरपन्थी,
अब नहीं बुनेंगे धर्म-जाल।
आने वाला है नया साल।। 

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"गीत-महाइन्द्र की पंचायत" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Friday, November 21, 2014

जिनका पेटभरा हो उनको, भोजन नहीं कराऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।

महाइन्द्र की पंचायत में, भेदभाव की है भाषा,
अपनो की महफिल में, बौनी हुई सत्य की परिभाषा,
ऐसे सम्मेलन में, खुद्दारों का होगा मान नहीं,
नहीं टिकेगी वहाँ सरलता, ठहरेंगे विद्वान नही,
नोक लेखनी की अपनी में, भाला सदा बनाऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।

जिस सरिता में बहती प्रतिपल, व्यक्तिवाद हो धारा,
उससे लाख गुना अच्छी है, रत्नाकर की जल खारा,
नहीं पता था अमृत के घट में, होगा विष भरा हुआ,
आतंकों की परछायी से, राजा होगा डरा हुआ,
जिस व्यंजन को बाँटे अन्धा, उसे नहीं मैं खाऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।

उस पथ को कैसे भूलूँगा, जिस पथ का निर्माता हूँ,
मैं चुपचाप नहीं बैठूँगा, माता का उद्गाता हूँ,
ऊसर धरती में भी मैंने, बीज आस के बोए हैँ,
शब्दों की माला में, नूतन मनके रोज पिरोए हैं,
खर-पतवार हटा उपवन में, पौधे नये लगाऊँगा।
जिस महफिल में उल्लू बोलें, वहाँ नहीं मैं गाऊँगा।।

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"चन्दा से चाँदनी का आधार माँगता हूँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Friday, June 6, 2014

मै प्यार का हूँ राही और प्यार माँगता हूँ।
मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।।
सूनी सी ये डगर हैं,
अनजान सा नगर हैं,
चन्दा से चाँदनी का आधार माँगता हूँ।
मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।।
सूरज चमक रहा है,
जग-मग दमक रहा है,
किरणों से रोशनी का संसार माँगता हूँ।
मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।।
यह प्रीत की है डोरी,
ममता की मीठी लोरी.
मैं स्नेहसिक्त पावन परिवार माँगता हूँ।
मंजिल से प्यार का ही उपहार माँगता हूँ।।

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"जिन्दादिली का प्रमाण दो" (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

Sunday, April 6, 2014


जिन्दा हो गर, तो जिन्दादिली का प्रमाण दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

स्वाधीनता का पाठ पढ़ाया है राम ने,
क्यों गिड़िगिड़ा रहे हो शत्रुओं के सामने,
अपमान करने वालों को हरगिज न मान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

तन्द्रा में क्यों पड़े हो, हिन्द के निवासियों,
सहने का वक्त अब नही, भारत के वासियों,
सौदागरों की बात पर बिल्कुल न ध्यान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

कश्मीर का भू-भाग दुश्मनों से छीन लो,
कैलाश-मानसर को भी अपने अधीन लो,
चीन-पाक को नही रज-कण का दान दो।
मुर्दों की तरह, बुज-दिली के मत निशान दो।।

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"वृक्ष नव पल्लव को पा जाता" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Friday, February 7, 2014


पतझड़ के पश्चात वृक्ष नव पल्लव को पा जाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।

भीषण सर्दी, गर्मी का सन्देशा लेकर आती ,
गर्मी आकर वर्षाऋतु को आमन्त्रण भिजवाती,
सजा-धजा ऋतुराज प्रेम के अंकुर को उपजाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।
खेतों में गेहूँ-सरसों का सुन्दर बिछा गलीचा,
सुमनों की आभा-शोभा से पुलकित हुआ बगीचा,
गुन-गुन करके भँवरा कलियों को गुंजार सुनाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।
पेड़ नीम का आगँन में अब फिर से है गदराया,
आम और जामुन की शाखाओं पर बौर समाया.
कोकिल भी मस्ती में भरकर पंचम सुर में गाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।

परिणय और प्रणय की सरगम गूँज रहीं घाटी में,
चन्दन की सोंधी सुगन्ध आती अपनी माटी में,
भुवन भास्कर स्वर्णिम किरणें धरती पर फैलाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।
मलयानिल से पवन बसन्ती चलकर वन में आया,
फागुन में सेंमल-पलाश भी, जी भरकर मुस्काया,
निर्झर भी कल-कल, छल-छल की सुन्दर तान सुनाता।
विध्वंसों के बाद नया निर्माण सामने आता।।

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"आओ नूतन वर्ष मनायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Tuesday, December 31, 2013


अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

मातम भी था और हर्ष था,
मिला-जुला ही गयावर्ष था,
भूल-चूक जो हमने की थीं,
उन्हें न फिर से हम दुहरायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

कभी न हो कोई दिन काला,
सूरज-चन्दा लाये उजाला,
छँटे कुहासा-हटे हताशा,
ग़म के बादल कभी न छायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

बन्द करें सब फिकरे-ताने,
देशभक्ति के गायें तराने,
फिल्में नहीं बने अब ऐसी,
जो कामुकता-भाव जगायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

शिक्षा का व्यापार बन्द हो,
सुमनों में भरपूर गन्ध हो,
कर्णधार सत्ता के मद में,
कभी न जनता को बिसरायें। 
अपना देश महान बनायें।
 आओ नूतन वर्ष मनायें।।

चमचे-गुण्डे और मवाली,
यहाँ न खाने पाये दलाली,
उनको ही मत देना अपना,
जो रिश्वत का चलन मिटायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।


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"नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Tuesday, December 24, 2013


नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
गधे चबाते हैं काजू,
महँगाई खाते बेचारे!!

काँपे माता काँपे बिटिया, भरपेट न जिनको भोजन है,
क्या सरोकार उनको इससे, क्या नूतन और पुरातन है,
सर्दी में फटे वसन फटे सारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

जो इठलाते हैं दौलत पर, वो खूब मनाते नया-साल,
जो करते श्रम का शीलभंग,वो खूब कमाते द्रव्य-माल,
वाणी में केवल हैं नारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

नव-वर्ष हमेशा आता है, सुख के निर्झर अब तक न बहे,
सम्पदा न लेती अंगड़ाई, कितने दारुण दुख-दर्द सहे,
मक्कारों के वारे-न्यारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

रोटी-रोजी के संकट में, नही गीत-प्रीत के भाते हैं,
कहने को अपने सारे हैं, पर झूठे रिश्ते-नाते हैं,
सब स्वप्न हो गये अंगारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

टूटा तन-मन भी टूटा है, अभिलाषाएँ ही जिन्दा हैं,
आयेगीं जीवन में बहार, यह सोच रहा कारिन्दा हैं,
कब चमकेंगें नभ में तारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

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"उड़कर परिन्दे आ गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Thursday, November 21, 2013

जंगलों में जब दरिन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
हो गये महरूम सब क्यों प्यार से?
क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

हो गया क्यों बे-रहम भगवान है?
क्यारियों में पनपता शैतान है?
हबस के बहशी पुलिन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

जुल्म की जो छाँव में हैं जी रहे,
जहर को अमृत समझकर पी रहे,
उनको भी कुछ दाँव-फन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

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‘‘.... सावन में।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

Sunday, July 14, 2013

पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें, झूला झूलें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

मँहगाई की मार पड़ी है, घी और तेल हुए महँगे,
कैसे तलें पकौड़ी अब, पापड़ क्या भूनें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

हरियाली तीजों पर, कैसे लायें चोटी-बिन्दी को,
सूखे मौसम में कैसे, अब सजें-सवाँरे सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

आँगन से कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा,
रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

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"लोग पुराने अच्छे लगते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

Saturday, April 20, 2013



गीत पुराने, नये तराने अच्छे लगते हैं।
हमको अब भी लोग पुराने अच्छे लगते हैं।

जब भी मन ने आँखे खोली, उनका दर्शन पाया,
देखी जब-जब सूरत भोली, तब-तब मन हर्षाया,
स्वप्न सुहाने, सुर पहचाने अच्छे लगते हैं,
मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।

रात-चाँदनी, हँसता-चन्दा, तारे बहुत रुलाते,
किसी पुराने साथी की वो, बरबस याद दिलाते,
उनके गाने, नये ठिकाने अच्छे लगते हैं।
मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।

घाटी-पर्वत, झरने झर-झर, अभिनव राग सुनाते,
पवन-बसन्ती, रिम-झिम बून्दें, मन में आग लगाते,
देश अजाने, लोग बिराने अच्छे लगते हैं।
मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।

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नापतोल.कॉम से कोई सामान न खरीदें।

मैंने Napptol.com को Order number- 5642977
order date- 23-12-1012 को xelectron resistive SIM calling tablet WS777 का आर्डर किया था। जिसकी डिलीवरी मुझे Delivery date- 11-01-2013 को प्राप्त हुई। इस टैब-पी.सी में मुझे निम्न कमियाँ मिली-
1- Camera is not working.
2- U-Tube is not working.
3- Skype is not working.
4- Google Map is not working.
5- Navigation is not working.
6- in this product found only one camera. Back side camera is not in this product. but product advertisement says this product has 2 cameras.
7- Wi-Fi singals quality is very poor.
8- The battery charger of this product (xelectron resistive SIM calling tablet WS777) has stopped work dated 12-01-2013 3p.m. 9- So this product is useless to me.
10- Napptol.com cheating me.
विनीत जी!!
आपने मेरी शिकायत पर करोई ध्यान नहीं दिया!
नापतोल के विश्वास पर मैंने यह टैबलेट पी.सी. आपके चैनल से खरीदा था!
मैंने इस पर एक आलेख अपने ब्लॉग "धरा के रंग" पर लगाया था!

"नापतोलडॉटकॉम से कोई सामान न खरीदें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिस पर मुझे कई कमेंट मिले हैं, जिनमें से एक यह भी है-
Sriprakash Dimri – (January 22, 2013 at 5:39 PM)

शास्त्री जी हमने भी धर्मपत्नी जी के चेतावनी देने के बाद भी
नापतोल डाट काम से कार के लिए वैक्यूम क्लीनर ऑनलाइन शापिंग से खरीदा ...
जो की कभी भी नहीं चला ....ईमेल से इनके फोरम में शिकायत करना के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला ..
.हंसी का पात्र बना ..अर्थ हानि के बाद भी आधुनिक नहीं आलसी कहलाया .....

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