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"आओ नूतन वर्ष मनायें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Tuesday, December 31, 2013


अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

मातम भी था और हर्ष था,
मिला-जुला ही गयावर्ष था,
भूल-चूक जो हमने की थीं,
उन्हें न फिर से हम दुहरायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

कभी न हो कोई दिन काला,
सूरज-चन्दा लाये उजाला,
छँटे कुहासा-हटे हताशा,
ग़म के बादल कभी न छायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

बन्द करें सब फिकरे-ताने,
देशभक्ति के गायें तराने,
फिल्में नहीं बने अब ऐसी,
जो कामुकता-भाव जगायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।

शिक्षा का व्यापार बन्द हो,
सुमनों में भरपूर गन्ध हो,
कर्णधार सत्ता के मद में,
कभी न जनता को बिसरायें। 
अपना देश महान बनायें।
 आओ नूतन वर्ष मनायें।।

चमचे-गुण्डे और मवाली,
यहाँ न खाने पाये दलाली,
उनको ही मत देना अपना,
जो रिश्वत का चलन मिटायें। 
अपना देश महान बनायें।
आओ नूतन वर्ष मनायें।।


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"नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Tuesday, December 24, 2013


नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!
गधे चबाते हैं काजू,
महँगाई खाते बेचारे!!

काँपे माता काँपे बिटिया, भरपेट न जिनको भोजन है,
क्या सरोकार उनको इससे, क्या नूतन और पुरातन है,
सर्दी में फटे वसन फटे सारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

जो इठलाते हैं दौलत पर, वो खूब मनाते नया-साल,
जो करते श्रम का शीलभंग,वो खूब कमाते द्रव्य-माल,
वाणी में केवल हैं नारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

नव-वर्ष हमेशा आता है, सुख के निर्झर अब तक न बहे,
सम्पदा न लेती अंगड़ाई, कितने दारुण दुख-दर्द सहे,
मक्कारों के वारे-न्यारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

रोटी-रोजी के संकट में, नही गीत-प्रीत के भाते हैं,
कहने को अपने सारे हैं, पर झूठे रिश्ते-नाते हैं,
सब स्वप्न हो गये अंगारे!
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

टूटा तन-मन भी टूटा है, अभिलाषाएँ ही जिन्दा हैं,
आयेगीं जीवन में बहार, यह सोच रहा कारिन्दा हैं,
कब चमकेंगें नभ में तारे! 
नव-वर्ष खड़ा द्वारे-द्वारे!!

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"आ गई हैं सर्दियाँ" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री मयंक')

Monday, December 9, 2013


आ गई हैं सर्दियाँ मस्ताइए।
बैठकर के धूप में सुस्ताइए।।

पर्वतों पर नगमगी चादर बिछी.
बर्फबारी देखने को जाइए।
बैठकर के धूप में सुस्ताइए।।

रोज दादा जी जलाते हैं अलाव,
गर्म पानी से हमेशा न्हाइए।
बैठकर के धूप में सुस्ताइए।।

रात लम्बीदिन हुए छोटे बहुत,
अब रजाई तानकर सो जाइए।
बैठकर के धूप में सुस्ताइए।।

खूब खाओ सब हजम हो जाएगा,
शकरकन्दी भूनकर के खाइए।
बैठकर के धूप में सुस्ताइए।।

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"उड़कर परिन्दे आ गये" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Thursday, November 21, 2013

जंगलों में जब दरिन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

पूछते हैं वो दर-ओ-दीवार से,
हो गये महरूम सब क्यों प्यार से?
क्यों दिलों में भाव गन्दे आ गये?
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

हो गया क्यों बे-रहम भगवान है?
क्यारियों में पनपता शैतान है?
हबस के बहशी पुलिन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

जुल्म की जो छाँव में हैं जी रहे,
जहर को अमृत समझकर पी रहे,
उनको भी कुछ दाँव-फन्दे आ गये।
मेरे घर उड़कर परिन्दे आ गये।।

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"बालगीत-गिलहरी" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Monday, October 28, 2013

"गिलहरी"
बैठ मजे से मेरी छत पर,
दाना-दुनका खाती हो!

उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
तुमको पास बुलाने को, 
मैं मूँगफली दिखलाता हूँ,
कट्टो-कट्टो कहकर तुमको,
जब आवाज लगाता हूँ,
कुट-कुट करती हुई तभी तुम,
जल्दी से आ जाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
नाम गिलहरी, बहुत छरहरी, 
आँखों में चंचलता है,
अंग मर्मरी, रंग सुनहरी,
मन में भरी चपलता है,
हाथों में सामग्री लेकर,
बड़े चाव से खाती हो!

उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!
पेड़ों की कोटर में बैठी
धूप गुनगुनी सेंक रही हो,
कुछ अपनी ही धुन में ऐंठी
टुकर-टुकरकर देख रही हो,

भागो-दौड़ो आलस छोड़ो,
सीख हमें सिखलाती हो!
उछल-कूद करती रहती हो,
सबके मन को भाती हो!!

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"खाटू धाम का परिचय" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Tuesday, October 1, 2013

श्याम देव की कथा 

खाटू धाम का परिचय -
      भोग आरती दोपहर 12.15 बजे, संध्या आरती सायं 7.30 बजे और शयन आरती रात्रि 10 बजे होती है। गर्मियों के दिनों में इस समय थोड़ा बदलाव रहता है। कार्तिक शुक्ल एकादशी को श्यामजी के जन्मोत्सव के अवसर पर मंदिर के द्वार 24 घंटे खुले रहते हैं।
     सड़क मार्ग : खाटू धाम से जयपुर, सीकर आदि प्रमुख स्थानों के लिए राजस्थान राज्य परिवहन निगम की बसों के साथ ही टैक्सी और जीपें भी यहां आसानी से उपलब्ध हैं।
रेलमार्ग : निकटतम रेलवे स्टेशन रींगस जंक्शन (15 किलोमीटर) है।
वायुमार्ग : यहां से निकटतम हवाई अड्‍डा जयपुर है, जो कि यहाँ से करीब 80 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
     खाटू में श्याम के रूप में जिनकी पूजा की जाती है दरअसल वे भीम के पोते वीर बर्बरीक हैं। श्रीकृष्ण के वरदान स्वरूप ही उनकी पूजा श्याम रूप में की जाती है।
खाटू मंदिर  की स्थापना के विषय में कई मत प्रचलित है जिसमें कहा गया है की श्याम जी का शीश खाटू में रखा गया था जहां पर वर्तमान में खाटू श्यामजी मंदिर का निर्माण किया गया. कहा जाता है की एक गाय इस स्थान पर दुग्ध की धार बहा रही थी इस घटना को देखकर लोगों ने वहां खुदाई की तो शीश प्रकट हुआ था.
      जिसे एक ब्राह्मण को कुछ समय के लिये रखने के लिए दे दिया गया जब खाटू के राजा को सपने में शीश के स्थान के लिए मंदिर निर्माण का आदेश प्राप्त हुआ तो उसने इस स्थान पर मंदिर का निर्माण करवाया तथा कार्तिक एकादशी की पवित्र तिथि के दिन शीश को मन्दिर में सुशोभित किया गया. 


      वीर प्रसूता राजस्थान की धरा यूं तो अपने आंचल में अनेक गौरव गाथाओं को समेटे हुए है, लेकिन आस्था के प्रमुख केन्द्र खाटू की बात अपने आप में निराली है।शेखावाटी के सीकर जिले में स्थित है परमधाम खाटू। यहां विराजित हैं भगवान श्रीकृष्ण के कलयुगी अवतार खाटू श्यामजी। श्याम बाबा की महिमा का बखान करने वाले भक्त राजस्थान या भारत में ही नहीं बल्कि दुनिया के कोने-कोने में मौजूद हैं।
खाटू का श्याम मंदिर बहुत ही प्राचीन है, लेकिन वर्तमान मं‍दिर की आधारशिला सन 1720 में रखी गई थी। इतिहासकार पंडित झाबरमल्ल शर्मा के मुताबिक सन 1679 में औरंगजेब की सेना ने इस मंदिर को नष्ट कर दिया था। मंदिर की रक्षा के लिए उस समय अनेक राजपूतों ने अपना प्राणोत्सर्ग किया था।
खाटू में भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की पूजा श्याम के रूप में की जाती है। ऐसी मान्यता है कि महाभारत युद्ध के समय भगवान श्रीकृष्ण ने बर्बरीक को वरदान दिया था कि कलयुग में उसकी पूजा श्याम (कृष्ण स्वरूप) के नाम से होगी। खाटू में श्याम के मस्तक स्वरूप की पूजा होती है, जबकि निकट ही स्थित रींगस में धड़ स्वरूप की पूजा की जाती है।
       हर साल फाल्गुन मास शुक्ल पक्ष में यहां विशाल मेला भरता है, जिसमें देश-विदेश से भक्तगण पहुंचते हैं। हजारों लोग यहां पदयात्रा कर पहुंचते हैं, वहीं कई लोग दंडवत करते हुए खाटू नरेश के दरबार में हाजिरी देते हैं। यहां के एक दुकानदार रामचंद्र चेजारा के मुताबिक नवमी से द्वादशी तक भरने वाले मेले में लाखों श्रद्धालु आते हैं। प्रत्येक एकादशी और रविवार को भी यहां भक्तों की लंबी कतारें लगी होती हैं।
खाटू मंदिर में पांच चरणों में आरती होती है- मंगला आरती प्रात: 5 बजे, धूप आरती प्रात: 7 बजे,
दर्शनीय स्थल : श्याम भक्तों के लिए खाटू धाम में श्याम बाग और श्याम कुंड प्रमुख दर्शनीय स्थल हैं। श्याम बाग में प्राकृतिक वातावरण की अनुभूति होती है। यहां परम भक्त आलूसिंह की समाधि भी बनाई गई है। श्याम कुंड के बारे में मान्यता है कि यहां स्नान करने से श्रद्धालुओं के पाप धुल जाते हैं। पुरुषों और महिलाओं के स्नान के लिए यहां पृथक-पृथक कुंड बनाए गए हैं।
कैसे पहुँचें :
वीर बर्बरीक की कहानी
      भीम के पौत्र और घटोत्कच के पुत्र बर्बरीक की माता का नाम कामकटंककटा था, जिन्हें मोरवी के नाम से जाना जाता है। अत: बर्बरीक को मोरवीनंदन भी कहा जाता है। उन्होंने युद्ध कला अपनी मां सीखी। कठोर तपस्या कर भगवान शिव को प्रसन्न किया और तीन अमोघ बाण प्राप्त किए। इसी कारण उन्हें तीन बाणधारी के नाम से भी जाना जाता है। अग्नि देव ने प्रसन्न होकर उन्हें धनुष प्रदान किया। बर्बरीक तीनों लोकों को जीतने की सामर्थ्य रखते थे।
कौरवों और पांडवों के बीच महाभारत युद्ध तैयारियां पूरे जोरों पर थीं। चारों ओर इस युद्ध की चर्चाएं थीं। यह समाचार जब बर्बरीक को मिला तो उनकी भी युद्ध में शामिल होने की इच्छा हुई। वे अपनी मां से युद्ध में शामिल होने की अनुमति लेने पहुंचे। उन्होंने मां से आशीर्वाद लिया और उन्हें वचन दिया कि वे हारे हुए पक्ष का ही साथ देंगे।
      वे अपने नीले रंग के घोड़े पर सवार होकर तथा तीन बाण और धनुष लेकर युद्धक्षेत्र कुरुक्षेत्र की ओर प्रस्थान कर गए। मार्ग में उन्हें एक ब्राह्मण ने रोका और परिचय पूछा। यह ब्राह्मण और कोई नहीं लीलाधर कृष्ण स्वयं थे। योगेश्वर ने बर्बरीक पर व्यंग्य किया और पूछा क्या वह सिर्फ तीन बाण लेकर युद्ध में सम्मिलित होने आया? इस पर वीर बर्बरीक ने कहा कि शत्रु सेना को धराशायी करने के लिए मेरे तीन बाण ही काफी हैं। उन्होंने कहा कि यदि मैंने तीनों बाणों का प्रयोग कर लिया तो त्रिलोक में हा-हाकार मच जाएगा।
      कहा कि इसके सभी पत्तों को छेदकर बतलाओ तो जानें। बर्बरीक चुनौती को स्वीकार करते हुए अपने तरकस से एक तीर निकाला और पत्तों की ओर चलाया। क्षणभर में पत्तों को बेध कर बाण कृष्ण के आसपास मंडराने लगा। दरअसल, उन्होंने उस वृक्ष का एक पत्ता अपने पांव के नीचे छिपा लिया था।
इस पर बर्बरीक बोला- अपना पांव हटा लीजिए अन्यथा यह तीर आपको भी चोट पहुंचा सकता है। पूरी स्थिति को समझकर कृष्ण ने अपनी वाणी का तीर चलाया और बर्बरीक से पूछा- आखिर तुम किस पक्ष की ओर से युद्ध लड़ोगे। उसने अपनी मां को दिए वचन की बात बताई और कहा जो भी पक्ष इस युद्ध में कमजोर साबित होगा मैं उसकी तरफ से ही युद्ध करूंगा।
     कृष्ण जानते थे यदि बर्बरीक ने कौरवों का साथ दिया तो जीती हुई बाजी उनके हाथ से निकल सकती है। ब्राह्मण वेशधारी कृष्ण ने बर्बरीक से वचन लिया और दान में उसका सिर मांग लिया। बर्बरीक क्षण भर के हतप्रभ रह गए, लेकिन वे वचन दे चुके थे। उससे मुकरना भी नहीं चाहते थे। बर्बरीक ने सोचा कि ये कोई साधारण ब्राह्मण नहीं हैं। अत: ब्राह्मण से अपने वास्तविक स्वरूप में आने की प्रार्थना की। कृष्ण न सिर्फ वास्तविक रूप में प्रकट हुए बल्कि बर्बरीक की इच्छा अनुसार उसे अपने विराट रूप के भी दर्शन कराए।
बर्बरीक ने उनसे प्रार्थना की कि वह अंत तक युद्ध देखना चाहता है, कृष्ण ने उनकी यह बात स्वीकार कर ली। उनका सिर युद्धभुमि के समीप ही एक पहाड़ी पर स्थापित किया गया, जहां से बर्बरीक सम्पूर्ण युद्ध का जायजा ले सकते थे।
       युद्ध समाप्त हो चुका था। पांडवों में विजय का श्रेय लेने के लिए बहस जारी थी। इस पर कृष्ण ने कहा कि बर्बरीक का शीश संपूर्ण युद्ध का साक्षी है। अत: उससे बेहतर निर्णायक कोई और हो ही नहीं सकता। इस बर्बरीक के शीश ने उत्तर दिया कि महाभारत युद्ध में चारों ओर भगवान कृष्ण ही नजर आए। युद्धभूमि में सिर्फ उनका सुदर्शन चक्र घूमता हुआ दिखाई दे रहा था, जो शत्रु सेना को काट रहा था। महाकाली भी कृष्ण के आदेश पर शत्रु सेना का रक्तपान कर रही थीं। श्रीेकृष्ण ने प्रसन्न होकर शीश को वरदान दिया कि कलयुग में तुम मेरे नाम ‘श्याम नाम‘ से पूजित होंगे। तुम्हारे स्मरणमात्र से भक्तों का कल्याण होगा और धर्म, अर्थ काम मोक्ष की प्राप्ति होगी।
सोजन्य से-
अमन अग्रवाल मारवाड़ी 
फोटो गैलरी
खाटू में श्याम बाबा का मंदिर
शीश विग्रह के दर्शन
श्याम कुंड (यहाँ शीश निकला था )


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"जेन स्टिलो का तीसरा जन्मदिन" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Saturday, September 14, 2013

आज हिन्दी के पावन दिवस पर
मेरी नैनो कार की बड़ी बहन जेन स्टिलो का भी
तीसरा जन्मदिन है।

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"झंझावात बहुत फैले हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Wednesday, August 7, 2013

मेरे गीत को सुनिए-
अर्चना चावजी के मधुर स्वर में!

"झंझावात बहुत फैले हैं"

सुख के बादल कभी न बरसे, 
दुख-सन्ताप बहुत झेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

अनजाने से अपने लगते,
बेगाने से सपने लगते,
जिनको पाक-साफ समझा था,
उनके ही अन्तस् मैले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

बन्धक आजादी खादी में,
संसद शामिल बर्बादी में,
बलिदानों की बलिवेदी पर,
लगते कहीं नही मेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

ज्ञानी है मूरख से हारा,
दूषित है गंगा की धारा,
टिम-टिम करते गुरू गगन में,
चाँद बने बैठे चेले हैं!
जीवन की आपाधापी में,
झंझावात बहुत फैले हैं!!

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“पड़ गये झूले” (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Thursday, July 25, 2013

indradhanush
गन्दुमी सी पर्त ने ढक ही दिया आकाश नीला
देखकर घनश्याम को होने लगा आकाश पीला 

छिप गया चन्दा गगन में, हो गया मज़बूर सूरज

पर्वतों की गोद में से बह गया कमजोर टीला 

बाँटती सुख सभी को बरसात की भीनी फुहारें

बरसता सावन सुहाना हो गया चौमास गीला
savan ke jhoole
 पड़ गये झूले पुराने नीम के उस पेड़ पर
पास के तालाब से मेढक सुनाते सुर-सुरीला 

इन्द्र ने अपने धनुष का 
“रूप” सुन्दर सा दिखाया
सात रंगों से सजा है गगन में कितना सजीला

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‘‘.... सावन में।’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

Sunday, July 14, 2013

पेंग बढ़ाकर नभ को छू लें, झूला झूलें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

मँहगाई की मार पड़ी है, घी और तेल हुए महँगे,
कैसे तलें पकौड़ी अब, पापड़ क्या भूनें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

हरियाली तीजों पर, कैसे लायें चोटी-बिन्दी को,
सूखे मौसम में कैसे, अब सजें-सवाँरे सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

आँगन से कट गये नीम,बागों का नाम-निशान मिटा,
रस्सी-डोरी के झूले, अब कहाँ लगायें सावन में।
मेघ-मल्हारों के गाने को, कभी न भूलें सावन में।।

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"लीची होती बहुत रसीली" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Saturday, May 25, 2013

हरीलाल और पीली-पीली!
लीची होती बहुत रसीली!!
 IMG_1175
गायब बाजारों से केले।
सजे हुए लीची के ठेले।।
 
आम और लीची का उदगम।
मनभावन दोनों का संगम।।
 
लीची के गुच्छे हैं सुन्दर।
मीठा रस लीची के अन्दर।।
 IMG_1178
गुच्छा प्राची के मन भाया!
उसने उसको झट कब्जाया!!
 IMG_1179
लीची को पकड़ादिखलाया!
भइया को उसने ललचाया!!

प्रांजल के भी मन में आया!
सोचा इसको जाए खाया!!
IMG_1180 
गरमी का मौसम आया है!
लीची के गुच्छे लाया है!!
IMG_1177 
दोनों ने गुच्छे लहराए!
लीची के गुच्छे मन भाए!!

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"लोग पुराने अच्छे लगते हैं" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री ‘मयंक’)

Saturday, April 20, 2013



गीत पुराने, नये तराने अच्छे लगते हैं।
हमको अब भी लोग पुराने अच्छे लगते हैं।

जब भी मन ने आँखे खोली, उनका दर्शन पाया,
देखी जब-जब सूरत भोली, तब-तब मन हर्षाया,
स्वप्न सुहाने, सुर पहचाने अच्छे लगते हैं,
मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।

रात-चाँदनी, हँसता-चन्दा, तारे बहुत रुलाते,
किसी पुराने साथी की वो, बरबस याद दिलाते,
उनके गाने, नये ठिकाने अच्छे लगते हैं।
मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।

घाटी-पर्वत, झरने झर-झर, अभिनव राग सुनाते,
पवन-बसन्ती, रिम-झिम बून्दें, मन में आग लगाते,
देश अजाने, लोग बिराने अच्छे लगते हैं।
मीत पुराने, नये-जमाने अच्छे लगते हैं।।

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"वार्तालाप"

Tuesday, April 2, 2013

एक आदमी जंगल से गुजर रहा था । उसे
चार स्त्रियां मिली ।
उसने पहली से पूछा - बहन तुम्हारा नाम
क्या हैं ?
उसने कहा "बुद्धि "
तुम कहां रहती हो?
मनुष्य के दिमाग में।
दूसरी स्त्री से पूछा - बहनतुम्हारा नाम
क्या हैं ?
" लज्जा "।
तुम कहां रहती हो ?
आंख में ।
तीसरी से पूछा - तुम्हारा क्या नाम हैं ?
"हिम्मत"
कहां रहती हो ?
दिल में ।
चौथी से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
"तंदुरूस्ती"
कहां रहती हो ?
पेट में।
वह आदमी अब थोडा आगे बढा तों फिर उसे
चार पुरूष मिले।
उसने पहले पुरूष से पूछा -तुम्हारा नाम
क्या हैं ?
" क्रोध "
कहां रहतें हो ?
दिमाग में,
दिमाग में तो बुद्धि रहती हैं,
तुम कैसे रहते हो?
जब मैं वहां रहता हुं तो बुद्धि वहां से
विदा हो जाती हैं।
दूसरे पुरूष से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
उसने कहां -" लोभ"।
कहां रहते हो?
आंख में।
आंख में तो लज्जा रहती हैं तुम कैसे रहते हो।
जब मैं आता हूं तो लज्जा वहां से प्रस्थान
कर जाती हैं ।
तीसरें से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
जबाब मिला "भय"।
कहां रहते हो?
दिल में तो हिम्मत रहती हैं तुम कैसे रहते
हो?
जब मैं आता हूं तो हिम्मत वहां से
नौ दो ग्यारह हो जाती हैं।
चौथे से पूछा - तुम्हारा नाम क्या हैं ?
उसने कहा - "रोग"।
कहां रहतें हो?
पेट में।
पेट में तो तंदरूस्ती रहती हैं,
जब मैं आता हूं
तो तंदरूस्ती वहां से
रवाना हो जाती हैं।

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"एक होली ऐसी भी..." (डॉ0 रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Thursday, March 21, 2013


गलतफहमी-"एक होली ऐसी भी..."  
मेरे छोटे भाई बरेली के किसी चिकित्सालय में पशुचिकित्सा अधिकारी हैं। वह सपरिवार होली पर मेरे घर आये हुए थे। 
कुछ दिन पूर्व उनकी छोटी बेटी को बन्दर ने काट लिया था। 
नियमित अन्तराल पर उसको एण्टी रेबीज इंजक्शन लगना था।
लेकिन मुझे यह पता नही था।
     उस समय मैंने तीन कुत्ते पाल रखे हैं। उनमें एक अभी छोटा ही था। उसे भी छोटू ही कहते थे। अचानक मेरे डाक्टर भाई ने कहा कि भइया छोटू को एण्टी-रेबीज का इंजक्शन लगाना है।
मैंने सोचा कि छोटा भाई पशु चिकित्सक है इसलिए मेरे छोटू कुत्ते के लिए एण्टी-रेबीज का टीका लाया होगा। अतः मैं छोटू कुत्ते को पकड़ लाया और भाई से कहा कि इंजक्शन भर कर तैयार कर लो। 
     उसने भी सोचा कि भैया कुत्ते से खेल रहे होंगे। वह इंजक्शन भर कर ले आया और कहने लगा - भैया थोड़ी रूई और स्प्रिट दे दो।
    मैने कहा कि स्प्रिट की क्या जरूरत है। वह संकोच में कुछ नही बोला। मैंने फिर कहा कि इंजक्शन कुत्ते को ही तो लगाना है। स्प्रिट की क्या जरूरत है। 
     अब उसके चौंकने की बारी थी। वह बहुत जोर से हँसा।
    मैंने कहा कि इसमें इतना हँस क्यों रहे हो। अब उसकी पत्नी भी हँसने लगी। जब भेद खुला तो पता लगा कि इंजक्शन तो उनकी छोटी बेटी पल्लवी को लगना है। जिसे वो प्यार से छोटू कहते थे।
इस गलत फहमी को हर वर्ष होली पर याद कर लेते हैं 
और ठहाके लगा लेते हैं।

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‘‘तितली रानी’’ (डॉ. रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Sunday, March 10, 2013

मन को बहुत लुभाने वाली,
तितली रानी कितनी सुन्दर।
भरा हुआ इसके पंखों में,
रंगों का है एक समन्दर।।

उपवन में मंडराती रहती,
फूलों का रस पी जाती है।
अपना मोहक रूप दिखाने,
यह मेरे घर भी आती है।। 

भोली-भाली और सलोनी, 
यह जब लगती है सुस्ताने। 
इसे देख कर एक छिपकली,
आ जाती है इसको खाने।।

आहट पाते ही यह उड़ कर, 
बैठ गयी है चौखट के ऊपर। 
मेरा मन भी ललचाया है, 
मैं भी देखूँ इसको छूकर।। 

इसके रंग-बिरंगे कपड़े, 
होली की हैं याद दिलाते।
सजी धजी दुल्हन को पाकर,
बच्चे फूले नही समाते।।

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"हैप्पी प्रपोज्ड-डे" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

Friday, February 8, 2013

प्रस्तावदिवस की बधाई हो..!
आज है प्रस्ताव का दिन, प्रणय के उत्कर्ष का।

अब नहीं बाकी रहा है, वक्त विचार-विमर्श का।

उनके ही होते यहाँ पूरे सुनहरे ख्वाब है-

जो मनाते हर समय आनन्द अपने हर्ष का।।

"मयंक"

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"मौसम का हाल" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक)

Sunday, January 13, 2013

मित्रों! आज ही के दिन
दो वर्ष पहले यह रचनाएँ लिखी थी!
इन दो रचनाओं को अपना स्वर दिया है मेरी मुँहबोली भतीजी 
श्रीमती अर्चना चाव जी ने!

मौसम का हाल
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कुहरे और सूरज में,जमकर हुई लड़ाई।
जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

ज्यों ही सूरज अपनी कुछ किरणें चमकाता,
लेकिन कुहरा इन किरणों को ढकता जाता,
बासन्ती मौसम में सर्दी ने ली अँगड़ाई।
जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

साँप-नेवले के जैसा ही युद्ध हो रहा,
कभी सूर्य और कभी कुहासा क्रुद्ध हो रहा,
निर्धन की ठिठुरन से होती हाड़-कँपाई।
जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।

कुछ तो चले गये दुनिया से, कुछ हैं जाने वाले,
ऊनी वस्त्र कहाँ से लायें, जिनको खाने के लाले,
सुरसा के मुँह सी बढ़ती ही जाती है मँहगाई।
जीत गया कुहरा, सूरज ने मुँहकी खाई।।
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और दो दिनों में ही प्रकृति कितनी बदल गई!
कायदे से धूप अब खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

दे रहा मधुमास दस्तक, शीत भी जाने लगा,
भ्रमर उपवन में मधुर संगीत भी गाने लगा,
चटककर कलियाँ सभी खिलने लगी हैं।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

कल तलक कुहरा घना था, आज बादल छा गये,
सींचने आँचल धरा का, धुंध धोने आ गये,
पादपों पर हरितिमा खिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

सब पुरातन पात पेड़ों से, स्वयं झड़ने लगे हैं,
बीनकर तिनके परिन्दे, नीड़ को गढ़ने लगे हैं,
अब मुहब्बत चाक-ए-दिल सिलने लगी है।
लेखनी को ऊर्जा मिलने लगी है।।

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नापतोल.कॉम से कोई सामान न खरीदें।

मैंने Napptol.com को Order number- 5642977
order date- 23-12-1012 को xelectron resistive SIM calling tablet WS777 का आर्डर किया था। जिसकी डिलीवरी मुझे Delivery date- 11-01-2013 को प्राप्त हुई। इस टैब-पी.सी में मुझे निम्न कमियाँ मिली-
1- Camera is not working.
2- U-Tube is not working.
3- Skype is not working.
4- Google Map is not working.
5- Navigation is not working.
6- in this product found only one camera. Back side camera is not in this product. but product advertisement says this product has 2 cameras.
7- Wi-Fi singals quality is very poor.
8- The battery charger of this product (xelectron resistive SIM calling tablet WS777) has stopped work dated 12-01-2013 3p.m. 9- So this product is useless to me.
10- Napptol.com cheating me.
विनीत जी!!
आपने मेरी शिकायत पर करोई ध्यान नहीं दिया!
नापतोल के विश्वास पर मैंने यह टैबलेट पी.सी. आपके चैनल से खरीदा था!
मैंने इस पर एक आलेख अपने ब्लॉग "धरा के रंग" पर लगाया था!

"नापतोलडॉटकॉम से कोई सामान न खरीदें" (डॉ.रूपचन्द्र शास्त्री 'मयंक')

जिस पर मुझे कई कमेंट मिले हैं, जिनमें से एक यह भी है-
Sriprakash Dimri – (January 22, 2013 at 5:39 PM)

शास्त्री जी हमने भी धर्मपत्नी जी के चेतावनी देने के बाद भी
नापतोल डाट काम से कार के लिए वैक्यूम क्लीनर ऑनलाइन शापिंग से खरीदा ...
जो की कभी भी नहीं चला ....ईमेल से इनके फोरम में शिकायत करना के बाद भी कोई परिणाम नहीं निकला ..
.हंसी का पात्र बना ..अर्थ हानि के बाद भी आधुनिक नहीं आलसी कहलाया .....

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